Importance of ultrasound in pregnancy | Zealthy

गर्भावस्था में अल्ट्रासाउंड (सोनोग्राफी) क्यूँ जरुरी हैं?

Importance of ultrasound during pregnancy in hindi

Kyun hai pregnancy mein ultrasound ki zaroorat in hindi, Ultrasound in hindi

एक नज़र

  • अल्ट्रासाउंड एक सुरक्षित तकनीक है जिससे गर्भ में पल रहे बच्चे की जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
  • अल्ट्रासाउंड में किसी भी प्रकार की हानिकारक किरणों का इस्तेमाल नहीं किया जाता है।
  • अल्ट्रासाउंड से गर्भावस्था के दौरान योनि से खून आने का पता भी लगाया जा सकता है।

महिला के गर्भवती होते ही घर के सदस्यों और डॉक्टर के द्वारा अनेक तरह की सलाह दी जाती है जो खान-पान, पहनावे, काम, दवाओं आदि से जुड़ी हो सकती है। इसके साथ डॉक्टर अल्ट्रासाउंड (ultrasound in hindi) करवाने की सलाह सबसे पहले देते हैं। यह परीक्षा से, माता-पिता अपने बच्चे को पहली बार देख पाते है वह उनके लिए एक सुखद घटना होती है। हालाँकि, अल्ट्रासाउंड एक बहुत ही महत्वपूर्ण निदान कार्य (diagnostic function) है जो माता-पिता को उनके बच्चे के स्वास्थ्य के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान कर सकता है। अल्ट्रासाउंड एक सुरक्षित एवं सरल चिकित्सीय तकनीक है जिसे कराना आवश्यक होता है। इस अत्याधुनिक स्कैन टेक्निक से गर्भ में पल रहे बच्चे की स्थिति और उसके विकास के साथ-साथ गर्भ में भ्रूण की संख्या, उसकी दिल की धड़कन, लम्बाई, वजन आदि जैसी महत्वपूर्ण जानकारियाँ प्राप्त हो जाती हैं। इसके साथ कोई समस्या होने पर गर्भ में ही शिशु का इलाज भी किया जा सकता है। यही नहीं कुछ मामलों में अल्ट्रासाउंड द्वारा पहले ही पता चल जाता कि डिलीवरी नार्मल होगी या ऑपरेशन से। गर्भावस्था के दौरान होने वाले शारीरिक बदलावों के बारे में यहाँ पढ़े
सामान्य अल्ट्रासाउंड के साथ आजकल अधिक उन्नत अल्ट्रासाउंड का भी उपयोग बच्चे को देखने के लिए किया जाता हैं - जिसमें 3-डी अल्ट्रासाउंड (3-D ultrasound), 4-डी अल्ट्रासाउंड (4-D ultrasound) और भ्रूण इकोकार्डियोग्राफी (fetal echocardiography) शामिल है, जो भ्रूण के दिल को विस्तार से दिखाता है। ऐसे में इस लेख के माध्यम से जानें कि प्रेगनेंसी के दौरान अल्ट्रासाउंड क्यों और कितना जरूरी है।

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इस लेख़ में/\

  1. अल्ट्रासाउंड क्या है
  2. प्रेगनेंसी में अल्ट्रासॉउन्ड के प्रकार
  3. गर्भावस्था के दौरान सामान्यतः कितने अल्ट्रासॉउन्ड स्कैन करने पड़ते है
  4. अल्ट्रासाउंड को लेकर गलत धारणा और मान्यता
  5. गर्भावस्था के दौरान अल्ट्रासाउंड क्यों कराये ?
  6. निष्कर्ष
 

1.अल्ट्रासाउंड क्या है

What is ultrasound in hindi

Ultrasound kya hota hai in hindi, sonography in hindi

अल्ट्रासाउंड स्कैन (ultrasound scan in hindi) एक मेडिकल परीक्षण है जिसे सोनोग्राफी (sonography in hindi) के नाम से भी जाना जाती है। इस टेस्ट को अल्ट्रासाउंड मशीन की मदद से किया जाता है जिससे उच्च आवृत्ति वाली ध्वनि तरंगों (high-frequency sound waves) की मदद से शरीर के अंदर की तस्वीरें या चित्र लिए जाते हैं। गर्भावस्था के तीसरे माह में पहला अल्ट्रासाउंड कराने की सलाह दी जाती है। लेकिन अगर होने वाली माँ को किसी प्रकार की समस्या हो तो वह कभी भी अल्ट्रासाउंड करवा सकती है। इस स्कैन से पहले महिला को पर्याप्त मात्रा में पानी पीना होता है ताकि अल्ट्रासाउंड ठीक प्रकार से हो सके। अल्ट्रासाउंड करने के लिए महिला के पेट पर एक प्रकार का जैल (gel) लगाया जाता है और एक छोटे ट्रांसड्यूसर (transducer) या प्रोब (probe) को पेट पर घुमाया जाता है।
प्रेगनेंसी के दौरान अल्ट्रासाउंड दो प्रकार के होते हैं :-

1. रूटीन परीक्षण (Routine Examination) - गर्भावस्था की पुष्टिकरण करने के लिए, गर्भ में पल रहे बच्चों की संख्या, गर्भ में पानी(amniotic fluid) की मात्रा देखने हेतु और प्लेसेंटा(placenta) की स्थिति देखने के लिए।

2. लक्षित परीक्षण (Symptomatic Examination) - गर्भ में पल रहे भ्रूण में किसी प्रकार की असामान्यता का पता लगाने के लिए।

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2.प्रेगनेंसी में अल्ट्रासॉउन्ड के प्रकार

Types of pregnancy ultrasound in hindi

pregnancy ke douran ultrasound kitne prakar ka hota hain

यदि बच्चे अधिक डिटेल्ड इमेज (detailed image) देखने की आवश्यकता होने पर अधिक उन्नत अल्ट्रासाउंड तकनीकों (More advanced ultrasound techniques) का उपयोग किया जा सकता है। पारंपरिक अल्ट्रासाउंड के दौरान यदि डॉक्टर को कुछ समस्याओं का पता चला हो तब डॉक्टर आपको अधिक उन्नत अल्ट्रासाउंड तकनीकों(More advanced ultrasound techniques) का उपयोग करने की सलाह दे सकते है।

1. ट्रांसवजाइनल अल्ट्रासाउंड (Transvaginal ultrasound)

ट्रांसवजाइनल अल्ट्रासाउंड बच्चे की स्पष्ट छवि का उत्पादन करने के लिए किया जा सकता है। गर्भावस्था के शुरुआती दिनों के दौरान इस अल्ट्रासाउंड का उपयोग करने की अधिक संभावना होती है, जब गर्भ बहुत छोटा होता है और उसकी स्पष्ट छवि को कैप्चर(capture) करना अधिक कठिन होता है। इस परीक्षण के लिए, एक छोटा अल्ट्रासाउंड प्रोब (probe) जांच के लिए योनि में डाला जाता है और गर्भ का चित्र मॉनिटर पर लिया जाता हैं।

2. 3-डी अल्ट्रासाउंड ( 3D-Ultrasound)

पारंपरिक 2-डी अल्ट्रासाउंड से 3-डी अल्ट्रासाउंड आपके डॉक्टर को भ्रूण के और महिलाओं के अंगों की चौड़ाई, ऊंचाई और गहराई को देखने की अनुमति देता है। [1] यह अल्ट्रासाउंड आपकी गर्भावस्था के दौरान किसी भी संदिग्ध समस्या के निदान में विशेष रूप से सहायक हो सकता है। 3-डी अल्ट्रासाउंड साधारण अल्ट्रासाउंड के समान प्रक्रिया का पालन करता है, लेकिन यह 3-डी छवि बनाने के लिए एक विशेष प्रोब (probe) और सॉफ्टवेयर (software) का उपयोग करता है। यह अल्ट्रासाउंड परिक्षण करने के लिए डॉक्टर को विशेष प्रशिक्षण की भी आवश्यकता होती है।

3. 4-डी अल्ट्रासाउंड (4D-Ultrasound)

4-डी अल्ट्रासाउंड को डायनेमिक 3-डी अल्ट्रासाउंड भी कहा जाता है। अन्य अल्ट्रासाउंड से तुलना करे तो, 4-डी अल्ट्रासाउंड भ्रूण का मूविंग वीडियो भी बना सकता है। यह बच्चे के चेहरे और मूवमेंट की बेहतर छवि बना पाता है। यह हाइलाइट्स (high lights) और शैडो (shadows ) को भी बेहतर तरीके से कैप्चर करता है। यह अल्ट्रासाउंड अन्य अल्ट्रासाउंड के समान ही किया जाता है, लेकिन इसके लिए विशेष उपकरणों का उपयोग किया जाता है।

4. भ्रूण इकोकार्डियोग्राफी (Fetal echocardiography)

यदि आपके डॉक्टर को यह संदेह है कि आपके बच्चे को जन्मजात हृदय दोष हो सकता है, तो भ्रूण की 4-D इकोकार्डियोग्राफी की जाती है। यह परीक्षण पारंपरिक गर्भावस्था के अल्ट्रासाउंड के समान किया जा सकता है, लेकिन इसे पूरा होने में अधिक समय लग सकता है। यह भ्रूण के दिल की एक गहरी छवि को कैप्चर करता है - जैसे की हृदय (heart) के आकार और संरचना को दर्शाता है। यह अल्ट्रासाउंड आपके डॉक्टर को यह भी बताता है कि आपके बच्चे का दिल कैसे काम कर रहा है, जो हृदय की समस्याओं के निदान में मददगार हो सकता है। [2]

 

3.गर्भावस्था के दौरान सामान्यतः कितने अल्ट्रासॉउन्ड स्कैन करने पड़ते है

How many ultrasound scans are usually done during pregnancy ?in hindi

गर्भावस्था में अल्ट्रासॉउन्ड कब करना चाहिए, pregnancy mein ultrasound kb karana chahiye

गर्भावस्था में किए जाने वाले नियमित(routine) स्कैन हैं:

1. डेटिंग और वाएबिलिटी स्कैन (Dating and viability scan)

यह स्कैन प्रेगनेंसी का 6 सप्ताह से लेकर प्रेगनेंसी का 9 वे सप्ताह के बीच किया जाता है। आपको ये स्कैन डिलीवरी की और प्रेगनेंसी कब कंसीव हुई इसकी सही तारीख देता है। आप इस स्कैन के दौरान अपने बच्चे के दिल की धड़कन को भी सुन सकते हैं।

2. नुकल ट्रांसुलैन्सी स्कैन (Nuchal translucency (NT) scan)

इसे मॉर्फोलॉजी स्कैन (morphology scan) भी कहा जाता है। यह प्रेगनेंसी के 11 सप्ताह - २ दिन और प्रेगनेंसी का 13 सप्ताह - छह दिनों के बीच किया जा सकता है। इसे करने का सबसे अच्छा समय गर्भावस्था का 12 सप्ताह है। आपके गर्भाशय में रक्त प्रवाह कैसा हो रहा है इसका आकलन इस स्कैन में किया जाता है।

3. एनोमली स्कैन (Anomaly scan (TIFFA or ultrasound level II scan)

यह स्कैन प्रेगनेंसी के 18 वे सप्ताह से लेकर प्रेगनेंसी के 20 सप्ताह के बीच कभी भी किया जा सकता है । इससे बच्चा सामान्य रूप से विकसित हो रहा है या नहीं और कोई संरचनात्मक दोष है या नहीं ये देखने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। प्रेगनेंसी के पहिले ३ महीनो में एनोमली स्क्रीनिंग से भ्रूण में विसंगति जैसे ट्राइसॉमी 18 और 13 (trisomy 18 and 13)., ट्रिपलोइड (triploidy) और टर्नर सिंड्रोम (Turner syndrome) की पहचान दर में सुधार कर सकती है। [3]

4. ग्रोथस्कैन या फीटल वेल बीइंग स्कैन (Growth scan or fetal wellbeing scan)

यह स्कैन प्रेगनेंसी के 28 वे सप्ताह से प्रेगनेंसी के 32 वे सप्ताह के बीच किया जाता है। यह स्कैन आपके बच्चे के विकास के पैटर्न को दिखाता है जिससे डॉक्टर को महिलाओं के डाइट प्लान (Diet plan) और जरूरत पड़ने पर किसी भी रक्त परीक्षण की सलाह देने में मदद करता है।

5. ग्रोथस्कैन एंड कलर डोप्पलर (Growth scan and colour doppler)

यह स्कैन प्रेगनेंसी के 36 वे सप्ताह और प्रेगनेंसी के 40 वे सप्ताह के बीच किया जाता है । यह अंतिम स्कैन होता है जो आपके बच्चे की स्थिति और वजन का आकलन करता है। यह आपके बच्चे के चारों फैले तरल पदार्थ जिसे एमनिओटिक फ्लूइड (amniotic fluid) भी कहा जाता की भी जाँच करता है ,इस के साथ ही यदि गर्भनाल (Umbilical cord) उसकी गर्दन के आसपास दिखाई दे तो उसे भी दर्शाता है और भविष्य में होने वाले खतरे से बचाता है। डॉपलर अध्ययन आपके बच्चे के महत्वपूर्ण अंगों में रक्त प्रवाह को दर्शाता है जैसे की हार्ट, लंग्स, लिवर और किडनी।

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4.अल्ट्रासाउंड को लेकर गलत धारणा और मान्यता

Misconceptions regarding ultrasound in hindi

Ultrasound ko lekar hone wali galatfehmi in hindi


  • इस परीक्षण को लेकर यह धारणा है कि कई बार अल्ट्रासाउंड करने के से शिशु के मानसिक विकास पर दुष्प्रभाव पड़ता है।
  • अधिकतर जगहों पर यह लिखा होता है कि अल्ट्रासाउंड हमेशा खाली पेट करवाना चाहिए जबकि ऐसा नही है। कुछ लोगो का मानना होता है की अल्ट्रासाउंड खाली पेट कराया जाता है पर कैसा कुछ नहीं होता है क्युकी प्रेगनेंसी में माँ को ज्यादा देर भूखा नहीं रखा जाता। अल्ट्रासॉउन्ड करने से पहले महिलाओं को पानी ज्यादा पीने की सलाह दी जाती है। मेडिकल साइंस के अनुसार किये जाने वाले स्कैन पर निर्भर करता है कि खाली पेट रहने की ज़रुरत है या नहीं। अगर ऐसा होता है तो डॉक्टर आपको इसकी सलाह पहले ही दे देते है।
  • कुछ लोगों को लगता है गर्भवती स्त्री का अल्ट्रासाउंड होने पर बच्चे की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है, बच्चे का वजन कम हो जाता है और उसे गंभीर बीमारी होने की सम्भावना बढ़ जाती है। इन सब के लिए कई शोध किये गए हैं लेकिन अल्ट्रासाउंड से होने वाले हानिकारक प्रभाव प्रमाणित नहीं हो पाए है। इसके विपरीत किये गए अनुसंधान के अनुसार अल्ट्रासाउंड टेस्ट से बच्चों में जन्म से ही होने वाले दोष व मृत्यु दर में बहुत कमी आई है। इसकी सहायता से गर्भवती महिला के गर्भ के आखिरी माह तक बच्चे की कुशलता को सुनिश्चित कर पाती है।
  • लोगों में धारणा है कि अल्ट्रासाउंड परीक्षण करवाने से माँ और बच्चे पर बुरा असर पड़ता है लेकिन यह एक मिथ है। यह परीक्षण आप कितनी बार भी करवाएं इससे कोई नुकसान नहीं होता है।
  • लोगों में मिथक है कि कई बार अल्ट्रासाउंड करवाने से बच्चे के विकास पर बुरा असर पड़ता है लेकिन ऐसा नही है। इस परीक्षण से भ्रूण के मानसिक एवं शारीरिक विकास को किसी प्रकार की हानि नहीं पहुँचती है।
  • लोगों में यह धारणा बनी हुई है कि गर्भकाल के पहले तीन महीनों में अल्ट्रासाउंड करवाने से गर्भपात हो जाता है या इसकी संभावना बढ़ जाती है। लेकिन अल्ट्रासाउंड परीक्षण और गर्भपात का कोई सम्बन्ध नहीं है।
  • बहुत से लोगों को लगता है कि यदि महिला के एक बार करवाए गए अल्ट्रासाउंड परीक्षण में किसी प्रकार की अनियमितता नहीं है तो उसके प्रसव में भी कोई तकलीफ़ नहीं होगी लेकिन ऐसा नही है। गर्भकाल में महिला को हर महीने में अल्ट्रासाउंड करवाना चाहिए ताकि किसी समस्या का पता समय से लग जाये।
  • अल्ट्रासाउंड परीक्षण करवाने में दर्द बिलकुल नहीं होता है और इसे किसी भी लैब में करवाया जाया इसके परिणाम समान ही रहते हैं।
  • भावी माता पिता और उनके परिवार को समझना चाहिए कि अल्ट्रासाउंड परीक्षण करवाने से गर्भवती महिला के शरीर की पूरी जानकारी मिल जाती है लेकिन ऐसा नहीं है। अल्ट्रासाउंड के माध्यम से सिर्फ उस हिस्से की जानकारी मिलती है जिस हिस्से का परीक्षण करवाया जाता है।

और पढ़ें:Uterine Fibroids and its treatment

 

5.गर्भावस्था के दौरान अल्ट्रासाउंड क्यों कराये ?

Why to get an ultrasound during pregnancy in hindi

Pregnancy mein kyun karna chahiye ultrasound in hindi


  • बिना कोई कट लगाए अल्ट्रासाउंड से डॉक्टर माँ के पेट में पल रहे शिशु की स्थिति और उसके शरीर के अंगों जैसे मूत्राशय, आँख, गुर्दा, लीवर, अंडाशय, पित्ताशय, अग्नाशय, थॉयराइड, अंडकोष, रक्तवाहिकाओं आदि के विकास, दिल की धड़कन, बच्चे का वजन और किसी प्रकार की समस्या होने पर उसका सही इलाज किया जा सकता है।
  • प्रेगनेंसी के पहले कुछ महीने बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं क्योंकि शुरूआती महीनों में गर्भ में शिशु का विकास सही से हो रहा है या नहीं यह जानना जरूरी होता है। इस समय शरीर में कई हार्मोन (hormone) जैसे एचसीजी (hCG), प्रोजेस्टेरोन (progesterone), एस्ट्रोजन (estrogen), प्रोलेक्टिन (prolactin), रिलैक्सिन (relaxin), ऑक्सीटोसिन (oxytocin) आदि में बदलाव होते हैं। इसके साथ ही शुरू के समय में गर्भपात होने का ख़तरा भी सबसे ज्यादा होता है जिसके कई कारण होते सकते हैं जैसे धूम्रपान, शराब का सेवन, कच्चे अंडे का सेवन, पपीता, दर्दनिवारक दवाईयाँ (painkillers), मधुमेह (diabetes) आदि। अल्ट्रासाउंड कराकर इस बारे में जानकारी प्राप्त की जा सकती है और किसी भी प्रकार की समस्या होने पर डॉक्टर उसके अनुसार उपचार कर सकते हैं।
  • गर्भ में एक से अधिक शिशु हो सकते हैं। ऐसा होने पर अल्ट्रासाउंड की मदद से यह पता लगाया जा सकता है कि गर्भ में कितने शिशु हैं और वह संयुक्त या जुड़े (conjoined) हुए तो नहीं है। गर्भस्थ शिशु की संख्या का पहले पता चल जाने से उसी के अनुसार सावधानी रखी जा सकती है।
  • बच्चे के विकास के साथ-साथ उसका दिल एवं धड़कन सही चल रही है या नहीं, इस बात का पता लगाने के लिए भी अल्ट्रासाउंड किया जा सकता है। लेकिन भावी माँ बाप को यह समझना चाहिए कि सिर्फ बच्चे की धड़कन सुनने के लिए अल्ट्रासाउंड नहीं करवाना चाहिए क्योंकि वह तो स्टेथोस्कोप (stethoscope) से सुनी जा सकती है।
  • अल्ट्रासाउंड से शिशु कितने दिन या महीने का है और उसकी लम्बाई-वजन भी जानी जा सकती है।
  • शिशु सामान्य है या असामान्य या शिशु में कोई दोष हो तो उसके बारे में अल्ट्रासाउंड के द्वारा जानकारी मिल जाती है। यदि गर्भस्थ शिशु को कोई समस्या है तो अल्ट्रासाउंड करने से मिली जानकारी के बाद डॉक्टर कोई सलाह देते हैं। इसके लिए तीसरे महीने में अल्ट्रासाउंड करवाना चाहिए जिसे अनोमली स्कैन (anomaly scan) कहा जाता है, जिसे मेडिकल के क्षेत्र में टिफ्फा - टार्गेटेड इमेजिंग फॉर फीटल अनोमलिज (TIFFA -Targeted imaging for fetal anomalies) कहा जाता है।
  • गर्भ में शिशु की स्थिति के बारे में जानकारी प्राप्त करने में भी अल्ट्रासाउंड उपयोगी साबित होता है। प्रेगनेंसी की शुरुआत से लेकर प्रसव तक बच्चे की स्थिति जानने के लिए अल्ट्रासाउंड का प्रयोग किया जा सकता है।

गर्भ में पल रहे बच्चे की आम तौर पर तीन स्थिति हो सकती हैं :-

  1. सेफलिक (Cephalic): यह सामान्य स्थिति है जिसमें बच्चे का सर आगे की ओर होता है।
  2. ब्रीच (Breech): यह आम नहीं होता है जिसको बच्चे का उल्टा पैदा होना भी कहा जाता है।
  3. ट्रांसवर्स (Transverse): इस स्थिति का पता लगने पर यह इस बात संकेत होता है कि प्रसव ऑपरेशन के माध्यम से करवाना होगा। यदि गर्भ में शिशु सही पोजीशन में नहीं होता है तो डॉक्टर उसी के अनुसार इलाज या उपचार करते हैं और प्रसव सिजेरियन (cesarean) होगा या सामान्य (normal) इसका अंदाज़ा भी अल्ट्रासाउंड से लग जाता है।
  • अगर प्रेगनेंसी के दौरान रक्तस्त्राव (bleeding) या गर्भनाल (placenta) की स्थिति आदि का पता लगाने में अल्ट्रासाउंड सहायक साबित होता है। अल्ट्रासाउंड के माध्यम से एक्टोपिक गर्भावस्था (ectopic pregnancy) की संभावना का पता लगाया जा सकता है। अल्ट्रासाउंड (सोनोग्राफी) और बीटा एचसीजी (beta HCG) परीक्षण का उपयोग एक्टोपिक गर्भावस्था के लिए अधिक विश्वसनीय निदान की संभावनाएं प्रदान करता है। [4]
  • अल्ट्रासाउंड परीक्षण के माध्यम से गर्भाशय (uterus) में पानी की मात्रा का पता लगाया जा सकता है।

इसकी दो स्थितियाँ होती है :-

  1. पॉलीहाईड्राएमिनोस (polyhydramnios)- यानी पानी ज्यादा होना - एमनियोटिक द्रव्य ज्यादा हो जाए, तो बच्चे को कुछ समस्याएं हो सकती हैं, जैसे की -
  1. ओलिगोहाईड्राएमिनोस (oligohydramnios)- यानी पानी कम होना - एमनियोटिक द्रव (Amniotic fluid) कम होने से बच्चे में कुछ समस्याएँ हो सकती है -
  • बच्चे के लंग्स/ फेफड़े विकसित होने में मुश्किल होती है।
  • पहली तिमाही और दूसरी तिमाही की शुरुआत में एमनियोटिक द्रव कम होने पर गर्भपात याने मिस्कारीज (miscarriage) की संभावना बढ़ सकती है।
  • अगर यह समस्या ज्यादा बढ़ जाती है (24वें सप्ताह से पहले), तो बच्चे की मृत्यु का खतरा बना रहता है।
  • सिजेरियन डिलीवरी की आशंका भी बढ़ जाती है।

और पढ़ें:अनियमित माहवारी के साथ कैसे हो सकती हैं जल्द गर्भवती

 

6.निष्कर्ष

Conclusionin hindi

Nishkarsh

हर माँ चाहती है कि होने वाले बच्चे का स्वास्थ्य पूरी तरह सही रहे और किसी प्रकार की समस्या ना हो। लेकिन माँ के गर्भ में पल रहे शिशु के बारे में सारी जानकारी पाना मुश्किल होता है ऐसे में अल्ट्रासाउंड या सोनोग्राफी जैसे सुरक्षित परीक्षण गर्भावस्था के दौरान माँ और बच्चे दोनों की देखभाल करने में सहायता करते हैं। लेकिन कई लोग अल्ट्रासाउंड कराकर होने वाले शिशु का लिंग यानि होने वाला बच्चा बेटा है या बेटी जानने की कोशिश करते हैं जो गैर कानूनी है।

आर्टिकल की आख़िरी अपडेट तिथि:: 02 Jul 2020

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संदर्भ/\

  1. Tudorache Ş, Căpitănescu RG, Drăgușin RC, et al. “Implications of the First Trimester 2d and 3d Ultrasound in Pregnancy Outcome". Curr Health Sci J. 2019;45(3):311-315, PMID: 32042460.

  2. Qin Y, Zhang Y, Zhou X, et al. “Four-dimensional echocardiography with spatiotemporal image correlation and inversion mode for detection of congenital heart disease”. Ultrasound Med Biol. 2014;40(7):1434-1441, PMID: 24785438.

  3. Tekesin I. “The Value of Detailed First-Trimester Ultrasound Anomaly Scan for the Detection of Chromosomal Abnormalities”.Ultraschall Med. 2019;40(6):743-748, PMID: 30241105.

  4. Vogler A, Ribic-Pucelj M. “[The importance of ultrasound in the diagnosis of ectopic pregnancy]”. Jugosl Ginekol Perinatol. 1989;29(3-4):143-146, PMID: 2689800.

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