Importance of ultrasound in pregnancy | Zealthy

गर्भावस्था और अल्ट्रासाउंड : क्या है महत्ता?

Importance of ultrasound in pregnancy? in hindi

Kyun hai pregnancy mein ultrasound ki zaroorat in hindi

एक नज़र


  • अल्ट्रासाउंड एक सुरक्षित तकनीक है जिससे गर्भ में पल रहे बच्चे की जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

  • अल्ट्रासाउंड में किसी भी प्रकार की हानिकारक किरणों का इस्तेमाल नहीं किया जाता है।

  • अल्ट्रासाउंड से गर्भावस्था के दौरान योनि से खून आने का पता भी लगाया जा सकता है।

महिला के गर्भवती होते ही घर के सदस्यों और डॉक्टर के द्वारा अनेक तरह की सलाह दी जाती है जो खान-पान, पहनावे, काम, दवाओं आदि से जुड़ी हो सकती है।

इसके साथ डॉक्टर अल्ट्रासाउंड करवाने की सलाह सबसे पहले देते हैं।

यह एक सुरक्षित एवं सरल चिकित्सीय तकनीक है जिसे कराना आवश्यक है।

इस अत्याधुनिक स्कैन टेक्निक से गर्भ में पल रहे बच्चे की स्थिति और उसके विकास के साथ-साथ गर्भ में भ्रूण की संख्या, उसकी दिल की धड़कन, लम्बाई, वजन आदि जैसी महत्वपूर्ण जानकारियाँ प्राप्त हो जाती हैं।

इसके साथ कोई समस्या होने पर गर्भ में ही शिशु का इलाज भी किया जा सकता है।

यही नहीं कुछ मामलों में अल्ट्रासाउंड द्वारा पहले ही पता चल जाता कि डिलीवरी नार्मल होगी या ऑपरेशन से।

ऐसे में इस लेख के माध्यम से जानें कि प्रेगनेंसी के दौरान अल्ट्रासाउंड क्यों और कितना जरूरी है।

 

1.अल्ट्रासाउंड क्या है

What is ultrasound in hindi

Ultrasound kya hota hai in hindi

अल्ट्रासाउंड स्कैन (ultrasound scan) एक मेडिकल परीक्षण है जिसे सोनोग्राफी (sonography) के नाम से भी जाना जाती है।

इस टेस्ट को अल्ट्रासाउंड मशीन की मदद से किया जाता है जिससे उच्च आवृत्ति वाली ध्वनि तरंगों (high-frequency sound waves) की मदद से शरीर के अंदर की तस्वीरें या चित्र लिए जाते हैं।

गर्भावस्था के तीसरे माह में पहला अल्ट्रासाउंड कराने की सलाह दी जाती है।

लेकिन अगर होने वाली माँ को किसी प्रकार की समस्या हो तो वह कभी भी अल्ट्रासाउंड करवा सकती है।

इस स्कैन से पहले महिला को पर्याप्त मात्रा में पानी पीना होता है ताकि अल्ट्रासाउंड ठीक प्रकार से हो सके।

अल्ट्रासाउंड करने के लिए महिला के पेट पर एक प्रकार का जैल (gel) लगाया जाता है और एक छोटे ट्रांसड्यूसर (transducer) या प्रोब (probe) को पेट पर घुमाया जाता है।

इसको करने के दो तरीके होते हैं :-

  1. रूटीन परीक्षण - गर्भावस्था की पुष्टिकरण करने के लिए, गर्भ में पल रहे बच्चों की संख्या, गर्भ में पानी की मात्रा देखने हेतु और प्लेसेंटा की स्थिति देखने के लिए।

  2. लक्षित परीक्षण - गर्भ में पल रहे भ्रूण में किसी प्रकार की असामान्यता का पता लगाने के लिए।

 

2.अल्ट्रासाउंड को लेकर गलत धारणा

Misconceptions regarding ultrasound in hindi

Ultrasound ko lekar hone wali galatfehmi in hindi

इस परीक्षण को लेकर यह धारणा है कि कई बार अल्ट्रासाउंड करने के से शिशु के मानसिक विकास पर दुष्प्रभाव पड़ता है।

कुछ लोगों को लगता है गर्भवती स्त्री का अल्ट्रासाउंड होने पर बच्चे की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है, बच्चे का वजन कम हो जाता है और उसे गंभीर बीमारी होने की सम्भावना बढ़ जाती है।

इन सब के लिए कई शोध किये गए हैं लेकिन अल्ट्रासाउंड से होने वाले हानिकारक प्रभाव प्रमाणित नहीं हो पाए है।

इसके विपरीत किये गए अनुसंधान के अनुसार अल्ट्रासाउंड टेस्ट से बच्चों में जन्म से ही आने वाले दोष व मृत्यु दर में बहुत कमी आई है।

इसकी सहायता से गर्भवती महिला के गर्भ के आखिरी माह तक बच्चे की कुशलता को सुनिश्चित कर पाती है।

लोगों में धारणा है कि अल्ट्रासाउंड परीक्षण करवाने से माँ और बच्चे पर बुरा असर पड़ता है लेकिन यह एक मिथ है।

यह परीक्षण आप कितनी बार भी करवाएं इससे कोई नुकसान नहीं होता है।

लोगों में मिथक है कि कई बार अल्ट्रासाउंड करवाने से बच्चे के विकास पर बुरा असर पड़ता है लेकिन ऐसा नही है

इस परीक्षण से भ्रूण के मानसिक एवं शारीरिक विकास को किसी प्रकार की हानि नहीं पहुँचती है।

लोगों में यह धारणा बनी हुई है कि गर्भकाल के पहले तीन महीनों में अल्ट्रासाउंड करवाने से गर्भपात हो जाता है या इसकी संभावना बढ़ जाती है।

लेकिन अल्ट्रासाउंड परीक्षण और गर्भपात का कोई सम्बन्ध नहीं है।

बहुत से लोगों को लगता है कि यदि महिला के एक बार करवाए गए अल्ट्रासाउंड परीक्षण में किसी प्रकार की अनियमितता नहीं है तो उसके प्रसव में भी कोई तकलीफ़ नहीं होगी लेकिन ऐसा नही है।

गर्भकाल में महिला को हर महीने में अल्ट्रासाउंड करवाना चाहिए ताकि किसी समस्या का पता समय से लग जाये।

अल्ट्रासाउंड परीक्षण करवाने में दर्द बिलकुल नहीं होता है और इसे किसी भी लैब में करवाया जाया इसके परिणाम समान ही रहते हैं।

भावी माता पिता और उनके परिवार को समझना चाहिए कि अल्ट्रासाउंड परीक्षण करवाने से गर्भवती महिला के शरीर की पूरी जानकारी मिल जाती है लेकिन ऐसा नहीं है।

अल्ट्रासाउंड के माध्यम से सिर्फ उस हिस्से की जानकारी मिलती है जिस हिस्से का परीक्षण करवाया जाता है।

अधिकतर जगहों पर यह लिखा होता है कि अल्ट्रासाउंड हमेशा खाली पेट करवाना चाहिए जबकि ऐसा नही है।

मेडिकल साइंस के अनुसार किये जाने वाले स्कैन पर निर्भर करता है कि खाली पेट रहने की ज़रुरत है या नहीं।

एब्डोमिनल स्कैन (abdominal scan) के लिए खाली पेट रहना ज़रूरी है जबकि गर्भवती महिला को काफी देर तक भूखे रहने से नुकसान हो सकता है।

 

3.गर्भावस्था के दौरान अल्ट्रासाउंड क्यों कराये

Why to get an ultrasound during pregnancy in hindi

Pregnancy mein kyun karna chahiye ultrasound in hindi

  • बिना कोई कट लगाए अल्ट्रासाउंड से डॉक्टर माँ के पेट में पल रहे शिशु की स्थिति और उसके शरीर के अंगों जैसे मूत्राशय, आँख, गुर्दा, लीवर, अंडाशय, पित्ताशय, अग्नाशय, थॉयराइड, अंडकोष, रक्तवाहिकाओं आदि के विकास, दिल की धड़कन, बच्चे का वजन और किसी प्रकार की समस्या होने पर उसका सही इलाज किया जा सकता है।

  • गर्भावस्था के पहले कुछ महीने बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं क्योंकि शुरूआती महीनों में गर्भ में शिशु का विकास सही से हो रहा है या नहीं यह जानना जरूरी होता है।

    इस समय शरीर में कई हार्मोन (hormone) जैसे एचसीजी (hCG), प्रोजेस्टेरोन (progesterone), एस्ट्रोजन (estrogen), प्रोलेक्टिन (prolactin), रिलैक्सिन (relaxin), ऑक्सीटोसिन (oxytocin) आदि में बदलाव होते हैं।

    इसके साथ ही शुरू के समय में गर्भपात होने का ख़तरा भी सबसे ज्यादा होता है जिसके कई कारण होते सकते हैं जैसे धूम्रपान, शराब का सेवन, कच्चे अंडे का सेवन, पपीता, दर्दनिवारक दवाईयाँ (painkillers), मधुमेह (diabetes) आदि।

    अल्ट्रासाउंड कराकर इस बारे में जानकारी प्राप्त की जा सकती है और किसी भी प्रकार की समस्या होने पर डॉक्टर उसके अनुसार उपचार कर सकते हैं।

  • गर्भ में एक से अधिक शिशु हो सकते हैं। ऐसा होने पर अल्ट्रासाउंड की मदद से यह पता लगाया जा सकता है कि गर्भ में कितने शिशु हैं और वह संयुक्त या जुड़े (conjoined) हुए तो नहीं है।

    गर्भस्थ शिशु की संख्या का पहले पता चल जाने से उसी के अनुसार सावधानी रखी जा सकती है।

  • बच्चे के विकास के साथ-साथ उसका दिल एवं धड़कन सही चल रही है या नहीं, इस बात का पता लगाने के लिए भी अल्ट्रासाउंड किया जा सकता है।

    लेकिन भावी माँ बाप को यह समझना चाहिए कि सिर्फ बच्चे की धड़कन सुनने के लिए अल्ट्रासाउंड नहीं करवाना चाहिए क्योंकि वह तो स्टेथोस्कोप (stethoscope) से सुनी जा सकती है।

  • अल्ट्रासाउंड से शिशु कितने दिन या महीने का है और उसकी लम्बाई-वजन भी जानी जा सकती है।

  • शिशु सामान्य है या असामान्य या शिशु में कोई दोष हो तो उसके बारे में अल्ट्रासाउंड के द्वारा जानकारी मिल जाती है।

    यदि गर्भस्थ शिशु को कोई समस्या है तो अल्ट्रासाउंड करने से मिली जानकारी के बाद डॉक्टर कोई सलाह देते हैं।

    इसके लिए तीसरे महीने में अल्ट्रासाउंड करवाना चाहिए जिसे अनोमली स्कैन (anomaly scan) कहा जाता है जिसे मेडिकल के क्षेत्र में टिफ्फा (TIFFA - टार्गेटेड इमेजिंग फॉर फीटल अनोमलिज -Targeted imaging for fetal anomalies) कहा जाता है।

  • गर्भ में शिशु की स्थिति के बारे में जानकारी प्राप्त करने में भी अल्ट्रासाउंड उपयोगी साबित होता है।

    गर्भावस्था की शुरुआत से लेकर प्रसव तक बच्चे की स्थिति जानने के लिए अल्ट्रासाउंड का प्रयोग किया जा सकता है।

    गर्भ में पल रहे बच्चे की आम तौर पर तीन स्थिति हो सकती हैं :-

  1. सेफलिक (Cephalic): यह सामान्य स्थिति है जिसमें बच्चे का सर आगे की ओर होता है।

  2. ब्रीच (Breech): यह आम नहीं होता है जिसको बच्चे का उल्टा पैदा होना भी कहा जाता है।

  3. ट्रांसवर्स (Transverse): इस स्थिति का पता लगने पर यह इस बात संकेत होता है कि प्रसव ऑपरेशन के माध्यम से करवाना होगा।

    यदि गर्भ में शिशु सही पोजीशन में नहीं होता है तो डॉक्टर उसी के अनुसार इलाज या उपचार करते हैं और प्रसव सिजेरियन (caesarian) होगा या सामान्य (normal) इसका अंदाज़ा भी अल्ट्रासाउंड से लग जाता है।

  • अगर गर्भावस्था के दौरान रक्तस्त्राव (bleeding) या गर्भनाल (placenta) की स्थिति आदि का पता लगाने में अल्ट्रासाउंड सहायक साबित होता है।

  • अल्ट्रासाउंड के माध्यम से एक्टोपिक गर्भावस्था (ectopic pregnancy) की संभावना का पता लगाया जा सकता है।

  • अल्ट्रासाउंड परीक्षण के माध्यम से गर्भाशय (uterus) में पानी की मात्रा का पता लगाया जा सकता है।

    इसकी दो स्थितियाँ होती है :-

  1. पॉलीहाईड्राएमिनोस (polyhydramnios), यानी पानी ज्यादा होना

  2. ओलिगोहाईड्राएमिनोस (oligohydramnios), यानी पानी कम होना

 

4.निष्कर्ष

Conclusionin hindi

Nishkarshin hindi

हर माँ चाहती है कि होने वाले बच्चे का स्वास्थ्य पूरी तरह सही रहे और किसी प्रकार की समस्या ना हो।

लेकिन माँ के गर्भ में पल रहे शिशु के बारे में सारी जानकारी पाना मुश्किल होता है ऐसे में अल्ट्रासाउंड या सोनोग्राफी जैसे सुरक्षित परीक्षण गर्भावस्था के दौरान माँ और बच्चे दोनों की देखभाल करने में सहायता करते हैं।

लेकिन कई लोग अल्ट्रासाउंड कराकर होने वाले शिशु का लिंग यानि होने वाला बच्चा बेटा है या बेटी जानने की कोशिश करते हैं जो गैर कानूनी है।

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